ग़ार-ए-हिरा जबल-ए-नूर की चोटी के पास एक छोटा-सा ग़ार है। नबूवत से पहले नबी करीम ﷺ मक्का की बुतपरस्ती से दूर यहाँ लंबे समय तक तन्हाई और ग़ौर-ओ-फ़िक्र में गुज़ारा करते थे।
पहली वही
रमज़ान के महीने में इसी ग़ार में हज़रत जिब्रील (अलै.) नबी करीम ﷺ के पास क़ुरआन के पहले अल्फ़ाज़ लेकर आए: "पढ़ अपने रब के नाम से जिसने पैदा किया…" (सूरह अल-अलक़, 96:1–5)। नबी करीम ﷺ काँपते हुए हज़रत ख़दीजा (रज़ि.) के पास लौटे और उन्होंने आप ﷺ को तसल्ली दी और सहारा दिया। यही लम्हा इस्लाम के पैग़ाम की शुरुआत था।
ग़ार कैसा है
- तंग ग़ार, जिसमें एक वक़्त में चंद लोग ही समा सकते हैं।
- भीड़ हो सकती है, इसलिए सब्र रखें और दूसरों को भी मौक़ा दें।
- पहाड़ से मक्का और हरम का नज़ारा दिखता है।
ज़ियारत का अदब
- यह इतिहास और ग़ौर-ओ-फ़िक्र की जगह है — अदब और ख़ामोशी रखें।
- ग़ार को इबादत के रस्मों की जगह न समझें; यहाँ कोई अमल लाज़िम नहीं।
- जाने से पहले हमारी जबल-ए-नूर की गाइड में चढ़ाई के व्यावहारिक सुझाव पढ़ लें।
वहाँ कैसे पहुँचें
प्राइवेट टैक्सी आपको मक्का के होटल से जबल-ए-नूर के दामन तक ले जाती है और मक्का की दूसरी ज़ियारतों पर भी जा सकती है। किराया देखने के लिए ऊपर यह टूर बुक करें दबाएँ।